
नन्हे आरिस सिद्दीक़ी ने रखा पहला रोजा आठ साल की उम्र में दिखाई ईमान और सब्र की अनोखी मिसाल,
मोहल्ला मौलानान निवासी एक नन्हे रोजेदार ने ऐसा जज़्बा दिखाया, जिसने हर किसी का दिल जीत लिया।
सादिक सिद्दीक़ी
कांधला। रमजान का पाक महीना शुरू होते ही पूरे कस्बे में रूहानियत और उत्साह का माहौल है। लोग सुबह से लेकर शाम तक इबादत, तिलावत और रोज़े में मशगूल नज़र आ रहे हैं। इसी माहौल के बीच कस्बे के मोहल्ला मौलानान में रहने वाले एक नन्हे रोजेदार ने ऐसा जज़्बा दिखाया, जिसने हर किसी का दिल जीत लिया।मोहल्ला मौलानान निवासी 8 वर्षीय आरिस सिद्दीक़ी पुत्र नावेद सिद्दीक़ी ने शुक्रवार को अपने जीवन का पहला रोजा रखकर मिसाल पेश की। इतनी कम उम्र में भूख-प्यास की परवाह किए बिना पूरे दिन रोजे पर क़ायम रहना, सब्र बनाए रखना और इबादत में लगे रहना यह छोटा कदम नहीं, बल्कि बड़ी हिम्मत का काम था।परिवार के लोगों का कहना है कि सुबह सहरी के वक्त आरिस खुद उठ गया और बोला “आज मैं भी रोजा रखूंगा, मुझे अल्लाह के लिए सब्र करना है।”
घरवालों ने सोचा कि शायद कुछ घंटों में वह थक जाएगा, लेकिन आरिस ने पूरे दिन रोजा निभाया और शाम तक न थकने वाला हौसला दिखाया।जब इफ्तार का वक्त आया और आरिस ने खजूर से रोजा खोला, तो पूरा घर खुशियों से झूम उठा। परिवारजन की आंखों में गर्व और खुशी के आंसू थे। पड़ोसी भी नन्हे रोजेदार को देखने पहुंचे और उसे दुआएं दीं।मोहल्ले में हर कोई कह रहा था “इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी इबादत वाकई ये बच्चा सबके लिए प्रेरणा है।”
आरिस ने मुस्कुराते हुए कहा,
“रमजान खुदा का महीना है, रोजा रखना हमें सब्र और शुक्र सिखाता है। मैं पूरे महीने रोजे रखूंगा और खूब दुआ करूंगा।”
उसकी मासूम मुस्कान और ईमान से भरे शब्दों ने हर सुनने वाले का दिल छू लिया। आरिस का यह पहला रोजा अब पूरे कांधला कस्बे में चर्चा का विषय बन गया है। लोग कह रहे हैं “नन्हा रोजेदार आरिस, उम्र छोटी लेकिन हौसला बड़ा!”मोहल्ले के बुजुर्गों ने कहा कि आज के बच्चे अगर इतनी कम उम्र में इबादत और सब्र का महत्व समझने लगें, तो समाज में नेकियों की रौशनी और बढ़ेगी।“पहला रोजा रखा, न भूख की शिकायत, न प्यास की बात पूरे दिन चेहरे पर सिर्फ मुस्कान और ईमान की चमक!”