
मदरसों को लेकर सुफियान की टिप्पणी से मचा हड़कंप
* मदरसों पर उठे सवालों से गरमाई बहस आलोचना नहीं, आत्ममंथन की ज़रूरत” शकैब जे. अख्तर
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सादिक सिद्दीक़ी
कांधला।कस्बे के समाजसेवी शकेब जे अख्तर ने हास्य कलाकार सुफियान द्वारा मदरसों की कार्यप्रणाली, शिक्षा व्यवस्था और उनमें सुधार की आवश्यकता को लेकर दिए गए बयान के बाद क्षेत्र में नई बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं तक इस मुद्दे पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसी बीच समाजसेवी शकैब जे. अख्तर ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी संस्था पर उठने वाले सवालों का जवाब भावनाओं से नहीं, बल्कि तर्क, तथ्य और आत्ममंथन से दिया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि मदरसे समाज की महत्वपूर्ण शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाएं हैं, जिनकी जिम्मेदारी केवल दीन की तालीम देना ही नहीं बल्कि समाज को बेहतर सोच और नैतिकता की दिशा देना भी है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति इन संस्थाओं में सुधार, जवाबदेही या आधुनिक शिक्षा को लेकर सवाल उठाता है, तो उन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
शकैब जे. अख्तर ने महान शायर और चिंतक अल्लामा Muhammad Iqbal के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इक़बाल ने भी अपने समय में धार्मिक संस्थाओं में बढ़ती जड़ता और बौद्धिक ठहराव पर चिंता जताई थी। उन्होंने इक़बाल का मशहूर शेर पढ़ते हुए कहा
*”उठा मैं मदरसा ओ ख़ानक़ाह से ग़मनाक,*
न ज़िंदगी, न मोहब्बत, न मा’रिफ़त, न निगाह।”
उन्होंने कहा कि इक़बाल का यह संदेश आज भी समाज के लिए प्रासंगिक है। जब शिक्षा संस्थाएं अपने मूल उद्देश्य ज्ञान, चिंतन और चरित्र निर्माण से दूर होने लगती हैं, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर दिखाई देता है।
उन्होंने इक़बाल का एक अन्य प्रसिद्ध शेर भी सुनाया
“गला तो घोंट दिया अहल-ए-मदरसा ने तेरा,
कहाँ से आए सदा ‘ला इलाह इल्लल्लाह’।”
शकैब जे. अख्तर ने कहा कि यह शेर उस मानसिकता की आलोचना करता है जो सवाल पूछने और स्वतंत्र चिंतन को दबाने का प्रयास करती है। समाज तभी मजबूत बन सकता है जब वह आलोचना को दुश्मनी नहीं बल्कि सुधार के अवसर के रूप में स्वीकार करे।
उन्होंने यह भी कहा कि देश के हजारों मदरसे आज भी सीमित संसाधनों में ईमानदारी और समर्पण के साथ दीन और शिक्षा की सेवा कर रहे हैं। अनेक उलेमा और शिक्षक समाज को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन यदि कहीं भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता, कमजोर प्रबंधन या आधुनिक शिक्षा की कमी जैसी समस्याएं हैं, तो उन पर चर्चा होना भी जरूरी है।
अंत में उन्होंने कहा कि किसी संस्था की कमियों की ओर ध्यान दिलाना धर्म या समुदाय का विरोध नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक सुधार तभी संभव है जब समाज सत्य, ज्ञान, जवाबदेही और आत्म-सुधार की राह अपनाए।