पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगलों के अंधाधुंध कटान पर लगे रोक
पर्यावरण बचाने की मुहिम: कैराना के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एसडीएम को सौंपा प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन
तेलंगाना के जंगलों की त्रासदी से सबक लेने की अपील, कार्यकर्ताओं ने मांगी अंधाधुंध वन कटान पर रोक
सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद भी जारी है कटान: कैराना में उठी ‘जंगल बचाओ’ की मुहिम
शामली। कैराना। निरन्तर तत्पर सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को तहसील प्रशासन के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन सौंपकर देशभर में जंगलों के अंधाधुंध कटान पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की। संगठन के प्रतिनिधियों ने तेलंगाना के ‘कांचा गचीबावली जंगल’ में 400 एकड़ के वन क्षेत्र को बुलडोजर से काटे जाने की घटना को पर्यावरणीय विनाश का उदाहरण बताते हुए चिंता जताई।
एसडीएम को सौंपा गया ज्ञापन
संगठन के अध्यक्ष शमून उस्मानी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने एसडीएम कैराना स्वप्निल कुमार यादव को ज्ञापन सौंपा। इसमें कहा गया कि तेलंगाना सरकार द्वारा विकास के नाम पर किए गए इस कदम से जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचा है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वहां कटान रुका है, लेकिन देश के अन्य राज्यों में ऐसी घटनाओं की आशंका बनी हुई है।
“विकास vs पर्यावरण” पर सवाल
ज्ञापन में जोर देकर कहा गया कि सरकारें अक्सर पेड़ लगाने के दावे करती हैं, लेकिन मौजूदा जंगलों के संरक्षण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखातीं। कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में वनों का विनाश मानवता के लिए घातक सिद्ध होगा। उन्होंने केंद्र सरकार से पर्यावरण संरक्षण के लिए सख्त एडवाइजरी जारी करने और वन कटान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की।
क्या है तेलंगाना का मामला?
तेलंगाना के हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पास स्थित ‘कांचा गचीबावली जंगल’ को हाल में सरकारी मशीनरी द्वारा काटा जाने लगा था। पर्यावरणविदों के विरोध और कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाई। कार्यकर्ताओं ने इस घटना को देशव्यापी समस्या का प्रतीक बताया और कहा कि राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर प्रकृति के अधिकारों को प्राथमिकता देना होगा।
कार्यकर्ताओं ने जताई एकजुटता
इस अवसर पर संगठन के फरमान सिद्दीकी, सुहैल, माज चौधरी और फैसल समेत कई सदस्य मौजूद रहे। उन्होंने सभी राज्य सरकारों से अपील की कि वे वन संपदा के संरक्षण को राष्ट्रीय एजेंडा बनाएं और “विकास” के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों की बलि न दें।