
मां को कांवड़ में बैठाकर चले बेटे, दादी को कंधों पर लाए पोते… सुनना बना पूरे क्षेत्र की मिसाल
* श्रवण कुमार बने सुनना के युवा: मां-दादी को कांवड़ में बैठाकर लाए हरिद्वार से, 144 किलो गंगाजल की कांवड़ बनी आकर्षण का केंद्र
सादिक सिद्दीक़ी
कांधला। थाना क्षेत्र के गांव सुनना में इस वर्ष कांवड़ यात्रा केवल आस्था का पर्व नहीं रही, बल्कि मातृ-पितृ सेवा, भारतीय संस्कार और शिवभक्ति का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला जिसने पूरे क्षेत्र का दिल जीत लिया। हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर लौटे कांवड़ियों के गांव पहुंचते ही सुनना गांव हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से गूंज उठा। ढोल-नगाड़ों की थाप, पुष्पवर्षा और भव्य स्वागत ने पूरे गांव को शिवमय बना दिया।
इस ऐतिहासिक यात्रा की सबसे भावुक तस्वीर तब सामने आई जब गांव निवासी गौरव और खुशी, पुत्रगण जयभगवान, अपनी पूजनीय मां को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से पैदल यात्रा करते हुए गांव पहुंचे। वहीं बादल और शिवम, पुत्रगण अरविंद, अपनी दादी को कांवड़ में बैठाकर सकुशल गांव लेकर आए। युवाओं की इस सेवा, समर्पण और संस्कार को देखकर ग्रामीण भावुक हो उठे। हर किसी की जुबान पर एक ही बात थी—”आज के दौर में भी श्रवण कुमार जीवित हैं।”
इसी दौरान गांव के युवा लाला पुत्र बबलू ने अपनी अटूट आस्था और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए 144 किलो पवित्र गंगाजल की विशाल कांवड़ उठाकर गांव में प्रवेश किया। इतनी भारी कांवड़ लेकर पहुंचने पर ग्रामीणों ने फूल-मालाओं से उनका जोरदार स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच लाला का अभिनंदन हुआ और उनकी शिवभक्ति पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।
जैसे ही कांवड़ियों ने गांव की सीमा में प्रवेश किया, पूरा सुनना गांव उत्सव में बदल गया। जगह-जगह स्वागत द्वार सजाए गए, पुष्पवर्षा की गई और महिलाओं, युवाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों ने कांवड़ियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। ढोल की थाप पर ग्रामीण झूम उठे और पूरा वातावरण शिवभक्ति में डूब गया। ऐसा लग रहा था मानो गांव में कोई विशाल धार्मिक महोत्सव आयोजित हो रहा हो।
कार्यक्रम की जानकारी देते हुए क्षेत्र के सक्रिय समाजसेवी एवं युवा अभय हुड्डा ने कहा कि सुनना गांव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां की मिट्टी में भक्ति, संस्कार और सेवा की भावना रची-बसी है। उन्होंने कहा कि मां और दादी को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से पैदल लाना केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और मातृ-पितृ सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है। वहीं 144 किलो गंगाजल की कांवड़ लेकर पहुंचे लाला ने युवाओं के लिए साहस और समर्पण की नई मिसाल पेश की है।
कांवड़ियों के स्वागत के दौरान गांव में दीवाली जैसा उत्सव दिखाई दिया। घर-घर से लोग बाहर निकले, बच्चों में उत्साह देखते ही बन रहा था और महिलाओं ने बड़ी संख्या में पहुंचकर पुष्पवर्षा की। गांव के गणमान्य लोगों, युवाओं, बुजुर्गों और मातृशक्ति की मौजूदगी ने कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि सुनना गांव के युवाओं ने यह साबित कर दिया कि सच्ची शिवभक्ति केवल कांवड़ उठाने में नहीं, बल्कि मां-बाप और बुजुर्गों की सेवा करने में भी है। यही कारण है कि इस बार की कांवड़ यात्रा पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, संस्कार और सेवा की अनोखी मिसाल बन गई।