
रमज़ान का पाक महीना रहमत, सब्र और इंसानियत का पैग़ाम शायर डॉ जुनेद अख्तर
रोज़ा सिर्फ भूख-प्यास नहीं, रूह की पाकी और समाज की बेहतरी का सफ़र
सादिक सिद्दीक़ी
कांधला।रमज़ान का पाक महीना वह महीना है जिसमें अल्लाह तआला अपने बंदों पर रहमतों की बरसात करता है। यह महीना सब्र, तौबा और इंसानियत की तालीम देता है। कस्बे के मोहल्ला मौलानान निवासी मशहूर शायर डॉ. जुनेद अख्तर ने कहा कि रमज़ान का महीना इंसान की रूह को पाक और उसके किरदार को मजबूत बनाता है।उन्होंने कहा कि रोज़ा इंसान को सिखाता है कि भूख और प्यास का एहसास करके वह दूसरों की तकलीफ़ को समझ सके। जब इंसान खुद उस दर्द से गुज़रता है, तो उसके दिल में रहम और हमदर्दी का जज़्बा पैदा होता है यही एहसास समाज में इंसाफ़, बराबरी और इंसानियत को जन्म देता है।डॉ. जुनेद अख्तर ने कहा कि रमज़ान का महीना एक रूहानी ट्रेनिंग है, जिसमें इंसान अपनी ख्वाहिशों पर काबू करना सीखता है। यह महीना बताता है कि सब्र में ही सुकून है, और इंसानियत में ही खुदा की रज़ा। उन्होंने कहा कि रोज़ा इंसान को अंदर से मज़बूत बनाता है यह गुस्से को ठंडा करता है, झूठ से रोकता है, और दिल में तौबा का एहसास जगाता है।उन्होंने कहा कि अल्लाह को अपने बंदों की भूख-प्यास से कोई मतलब नहीं, बल्कि वह तो उनके सब्र, नीयत और एहसास को देखता है। रोज़ा उस इंसान को खास बना देता है जो खुदा के हुक्म को मानते हुए दूसरों के हक़ और तकलीफ़ का ख्याल रखता है।डॉ. जुनेद अख्तर ने बताया कि रमज़ान का महीना इंसानियत की“मदरसा-ए-तालीम” है, जहां हर रोज़ेदार को सब्र, शुक्र और रहम सिखाया जाता है। जब यह महीना खत्म होता है, तो इंसान का दिल पहले से ज़्यादा मुलायम और रूह पहले से ज़्यादा पाक हो जाती है।उन्होंने कहा “रोज़ा सिर्फ एक इबादत नहीं, बल्कि एक रूहानी क्रांति है जो इंसान के अंदर से शुरू होकर पूरे समाज को बदल देती है।” अगर हर इंसान अपने अंदर सब्र, रहम और इंसानियत पैदा कर ले, तो समाज अपने आप अमन और मोहब्बत की मिसाल बन जाएगा।
अंत में शायर डॉ. जुनेद अख्तर ने कहा कि रमज़ान का असल पैग़ाम यही है सब्र करो, शुक्र करो और इंसान बनो, क्योंकि रोज़े का असली इनाम सिर्फ इफ़्तार की थाली में नहीं, बल्कि उस रूहानी सुकून में है जो खुदा की राह पर चलने वाले रोज़ेदार को मिलता