
एक वो भी ज़माना था… जब साइकिल थी लोगों की शान और दहेज़ का सबसे बड़ा तोहफ़ा!
संवाददाता सादिक सिद्दीकी
कांधला। आज भले ही दहेज़ में कारें, मकान, लाखों रुपये और महंगे तोहफ़े दिए जाते हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब सिर्फ़ एक साइकिल ही दूल्हे और उसके परिवार की खुशियों का कारण बन जाया करती थी।उस दौर में साइकिल सिर्फ़ साधन नहीं थी, बल्कि रुतबे और इज़्ज़त की पहचान थी। शादी-ब्याह के मौके पर जब दूल्हे को दहेज़ में साइकिल मिलती, तो घर-परिवार और रिश्तेदारों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती। लोग कहते “भाई साहब! दूल्हे को तो दहेज़ में साइकिल मिली है, अब तो उसकी इज़्ज़त दोगुनी हो गई।”गाँव और कस्बों में उस नई साइकिल को देखने के लिए भीड़ इकट्ठा हो जाती। बच्चे दौड़-दौड़कर कहते—”अरे देखो, दूल्हे की नई साइकिल आई है!”दूल्हा जब शादी के बाद साइकिल पर बैठकर अपने गाँव की गलियों से गुजरता था, तो मानो पूरे इलाके की नज़रें उसी पर ठहर जाती थीं। उस समय साइकिल पाना उतना ही बड़ा गर्व था, जितना आज किसी के पास कार या बाइक होना।लेकिन वक्त बदला… और बदलते वक्त के साथ बदल गई लोगों की सोच भी।अब हालात ऐसे हैं कि चाहे दहेज़ में कितनी भी महंगी कार, मकान या लाखों रुपये दे दिए जाएँ, लोग कहते हैं— “अरे, और क्या मिला?”।जहाँ कभी सादगी में बेशुमार ख़ुशियाँ थीं, वहीं आज दिखावे और प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में भी सुकून कहीं गुम हो गया है।पहले साइकिल पर बैठकर दूल्हा खुद को राजा समझता था, अब कार में बैठकर भी तसल्ली नहीं मिलती।
बुज़ुर्ग आज भी पुरानी यादें ताज़ा करते हुए कहते हैं—
“बेटा, वो भी जमाना था जब साइकिल ही हमारी सबसे बड़ी दौलत और पहचान हुआ करती थी। आज के दौर में लाखों की कारें भी आम हो गई हैं, लेकिन उस साइकिल जैसी कद्र किसी चीज़ की नहीं।”यह ख़बर सिर्फ़ अतीत की झलक नहीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करने वाली कहानी भी है— तरक्की ने हमें बहुत कुछ दिया, मगर उस दौर की सादगी और संतोष छीन लिया।