जब एक किसान ने कांधला को देश के नक़्शे पर रोशन कर दिया!
विशेष रिपोर्ट: सादिक़ सिद्दीकी,
शामली कांधला। हर दौर में कुछ लोग जन्म लेते हैं, जो अपनी मेहनत, ईमानदारी और इंसानियत के दम पर वो काम कर जाते हैं जो सदियों तक याद रखे जाते हैं।
कांधला के बाबू रफीक ऐसे ही एक चमकते सितारे थे, जिनकी रौशनी आज भी लोगों के दिलों में जिन्दा है।
खेती को बनाया सम्मान का पेशा
कांधला की मिट्टी से जुड़ा एक सीधा-साधा किसान जब अपने खेतों को प्रयोगशाला बना ले और मेहनत को अपना हथियार — तो इतिहास लिखा जाता है।
बाबू रफीक ने कृषि को नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने खेती में नए प्रयोग किए, और एक बार ऐसा आम उगाया जिसका वज़न ढाई किलो था। उस दौर में ये कोई मामूली बात नहीं थी — पूरा क्षेत्र, यहां तक कि राज्य तक में चर्चा का विषय बन गया।
“खेती सिर्फ हल चलाने का नहीं, सोच और समझ का काम है,” ये बात उन्होंने करके दिखाई।

जब किसान बना देश का गौरव – मिला पद्मश्री सम्मान
बाबू रफीक के कृषिक्षेत्र और समाजसेवा में योगदान को भारत सरकार ने सलाम किया।
2 अप्रैल 1977 को उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया — और कांधला का नाम देशभर में गर्व से लिया जाने लगा।
वो उस ज़माने में सम्मानित हुए, जब न तो सोशल मीडिया था, न प्रचार-प्रसार।
बस उनके कर्म, सेवा और सादगी ने ही उन्हें देश का रत्न बना दिया।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी आईं दरवाज़े पर
एक किसान के दरवाज़े पर देश की प्रधानमंत्री खुद चलकर आएं — ये इतिहास में बहुत कम हुआ है।
इंदिरा गांधी, उस समय की सबसे ताक़तवर नेता, बाबू रफीक से मिलने कांधला उनके घर आईं।
उनके सम्मान में उन्होंने कहा था
“रफीक साहब जैसे लोग ही भारत की असली ताक़त हैं, जो मज़हब से ऊपर उठकर सिर्फ इंसान की सेवा करते हैं।”
धर्म नहीं, इंसानियत को अपनाया
बाबू रफीक की सबसे बड़ी पहचान थी उनका साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता में अटूट विश्वास।
हिंदू-मुस्लिम के बीच जब भी कोई खाई बनने लगी, बाबू रफीक अपने सलीके और समझदारी से सेतु का काम करते।
उनका घर हर धर्म के लोगों के लिए एक पनाहगाह था।
कभी त्योहारों में मिठाई बंटवाते तो कभी किसी की बेटी की शादी में मददगार बनते।
नसीब की करवट — इंतकाल के 3 दिन बाद आया राज्यपाल पद का पत्र
कुदरत ने जैसे एक आखिरी ताज उनके सिर पर सजाने की ठानी थी।
12 मार्च 1984 को बाबू रफीक का इंतकाल हुआ।
और उसके महज़ 3 दिन बाद, भारत सरकार द्वारा भेजा गया पत्र आया जिसमें उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया था।
पूरा कांधला स्तब्ध रह गया…
जिस बेटे ने कांधला को देश का गौरव बनाया, आज देश ने उसे गवाया।

पोता जुनेद मुख्या आज भी उसी राह पर
बाबू रफीक की विरासत आज भी जिन्दा है उनके पोते जुनेद मुख्या के रूप में।
मोहल्ला सरावज्ञान वार्ड नंबर 13 से सभासद चुने गए जुनेद, अपने दादा की राह पर चलते हुए जनता की निःस्वार्थ सेवा में लगे हैं।
उनकी जुबान पर अक्सर अब्बा की बात होती है —
“बेटा, कभी गरीब की आह मत लेना, और मज़लूम के लिए हमेशा खड़ा रहना।”
आज भी कांधला की हवा पुकारती है — रफीक साहब…
आज भी कांधला की गलियों में जब किसी बुज़ुर्ग से बाबू रफीक का नाम लिया जाता है, तो लोग सिर झुकाकर कहते हैं —
“वो इंसान नहीं, फ़रिश्ता थे।”
उनकी याद में कोई संगमरमर की मूरत नहीं बनी, लेकिन लाखों दिलों में उनकी एक-एक बात आज भी खुदी हुई है।
अगर इस देश में हर कस्बे में एक बाबू रफीक पैदा हो जाए, तो मज़हब के नाम पर लड़ाइयाँ खत्म हो जाएँ और खेतों से क्रांति निकले…