कमाई जस की तस, महंगाई बेखौफ! रसोई के बढ़ते खर्च ने गरीब-मध्यम वर्ग की उड़ाई नींद

 

महंगाई की मार से हांफी रसोई, कमाई छोटी पड़ गई और खर्चे आसमान पर! गरीब-मध्यम वर्ग के सामने घर चलाने का संकट

 

पत्रकार सादिक सिद्दीक़ी

कांधला। महंगाई ने अब सिर्फ बाजार का भाव नहीं बढ़ाया, बल्कि आम आदमी की थाली और घर का पूरा बजट हिला दिया है आलू-प्याज और टमाटर की महंगाई की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन इस वक्त असली चिंता आटा, चावल, दाल, तेल, चीनी और खांड जैसी रोजमर्रा की जरूरतों के बढ़ते दाम हैं। चीनी और खांड के दामों में करीब 40 फीसदी तक उछाल ने लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है।

एक तरफ रोजगार की कमी, दूसरी तरफ बढ़ते खर्चे आम आदमी आखिर जाए तो जाए कहां? जिन लोगों के पास काम नहीं है, उनके सामने परिवार पालने की चिंता है और जिनके पास रोजगार है, उनकी कमाई महंगाई की रफ्तार से कदम नहीं मिला पा रही। नतीजा यह है कि महीने की शुरुआत में ही जेब हल्की होने लगी है और महीने के आखिरी दिनों में खर्च का हिसाब भारी पड़ रहा है।महंगाई की सबसे ज्यादा मार गरीब और मध्यम वर्ग की रसोई पर पड़ रही है। पहले जिस रकम में घर का जरूरी राशन आसानी से आ जाता था, अब उसी सामान के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ रहा है। परिवारों को अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ रही है। बढ़ते दामों ने घरेलू बजट का ऐसा गणित बिगाड़ दिया है कि आम परिवार के लिए बचत करना तो दूर, रोजमर्रा का खर्च निकालना ही चुनौती बनता जा रहा है।उच्च वर्ग के लिए कीमतों में बढ़ोतरी भले ही ज्यादा बड़ी परेशानी न हो, लेकिन सीमित आमदनी वाले परिवारों के लिए हर बढ़ा हुआ रुपया सीधे थाली पर असर डालता है। महंगाई बढ़ने के साथ लोगों की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं।

*महंगाई पर सियासत क्यों खामोश?*

सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर भी उठ रहा है। जो नेता कभी महंगाई को लेकर सड़क से संसद तक आवाज बुलंद करते थे, आज वही मुद्दा उतना गर्म नजर नहीं आ रहा। विपक्षी दल महंगाई के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पा रहे हैं और आम आदमी खुद को इस बढ़ती महंगाई के बीच अकेला महसूस कर रहा है।

 

लोगों के सामने सवाल सीधा है

जब आमदनी नहीं बढ़ रही तो बढ़ते खर्चों का बोझ आखिर कौन उठाएगा? रोजगार की कमी और रोजमर्रा की चीजों के बढ़ते दामों के बीच आम आदमी राहत की उम्मीद लगाए बैठा है।महंगाई अब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं रह गई है। यह घर के चूल्हे से लेकर बच्चों की जरूरतों और परिवार की बचत तक असर डाल रही है। जरूरत इस बात की है कि महंगाई पर राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि आम आदमी की रसोई में फिर से राहत की खुशबू लौट सके।

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