
माहे रमज़ान का पहला जुम्मा, मस्जिदों में अमन व भाईचारे की दुआओं से महका माहौल
सादिक सिद्दीक़ी
कांधला। माहे रमज़ान का पहला जुम्मा पूरे जज़्बे, इमान और रूहानी माहौल में मनाया गया। कस्बे की सभी मस्जिदों मे हजारों की तादाद में अकीदतमंदों ने नमाज-ए-जुमा अदा की। मस्जिदों के बाहर तक नमाजियों की कतारें लगीं रही और पूरा माहौल “अल्लाहु अकबर” की सदा से गूंज उठा।खुतबे से पहले मौलानाओ ने कहा कि “रमज़ान का महीना सिर्फ रोज़ा रखने का नहीं, बल्कि अपने गुनाहों की माफी मांगने और नेकियों को बढ़ाने का महीना है।” उन्होंने कहा कि पहला अशरा रहमत का, दूसरा मगफिरत का और तीसरा जहन्नुम से निजात का है। मुसलमानों को चाहिए कि वो सिर्फ भूख-प्यास से नहीं, बल्कि अपनी आंखों, ज़ुबान, कानों और हाथों को भी गुनाह से बचाएं यही असली रोज़ा है।मौलाना ने कुरान की आयत का हवाला देते हुए कहा कि “जो एक इंसान का नाहक़ क़त्ल करता है, वह पूरी इंसानियत का क़त्ल करता है, और जो एक ज़िंदगी बचाता है, वह पूरी इंसानियत को बचाता है।” उन्होंने समाज में अमन, इंसाफ़ और मोहब्बत का पैग़ाम देते हुए कहा कि मज़लूम की मदद करना और जालिम के खिलाफ खड़ा होना भी ईमान का हिस्सा है।नमाज़ अदा करने के बाद अकीदतमंदों ने मुल्क में अमन-चैन, भाईचारा और तरक्की की दुआ की। मस्जिदों के आसपास के बाजारों में भी रौनक रही। बच्चे, बूढ़े और नौजवान सभी के चेहरों पर इबादत और खुशी की चमक साफ़ झलक रही थी। “रहमतों भरा जुम्मा, दुआओं की बरसात