विभीषण शरणागति, रामसेतु निर्माण और अंगद-रावण संवाद की लीला का मंचन

 

सादिक सिद्दीक़ी

कांधला कस्बे के श्री सनातन धर्म मंदिर पंजाबी धर्मशाला में आयोजित श्री रामलीला मंचन कार्यक्रम में भगवान श्रीरामचंद्र की आरती के पश्चात विभीषण शरणागति, रामसेतु निर्माण, रावण को शरणागत होने का संदेश तथा अंगद-रावण संवाद की सुंदर लीलाओं का मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने सजीव अभिनय और प्रभावशाली संवादों के माध्यम से दर्शकों को रामायण के प्रसंगों से रूबरू कराया। इस दौरान भगवान श्रीराम की मर्यादा, धर्म की महत्ता, भक्ति, मित्रता और अहंकार के विनाश का संदेश दिया गया। लीला देखने के लिए पहुंचे श्रद्धालु भावविभोर नजर आए और जय श्रीराम के जयकारों से पंडाल गूंज उठा।मंचन के दौरान दिखाया गया कि लंकापति रावण द्वारा माता सीता का हरण किए जाने और उसके अधर्मपूर्ण व्यवहार का विरोध करने पर विभीषण उसे समझाने का प्रयास करते हैं। विभीषण रावण को सलाह देते हैं कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक भगवान श्रीराम को लौटा दे और अपने कुल के विनाश का कारण न बने। वह रावण को समझाते हैं कि भगवान श्रीराम से शत्रुता करना उचित नहीं है और धर्म के मार्ग पर चलना ही कल्याणकारी है। हालांकि, अहंकार में डूबा रावण विभीषण की नेक सलाह को स्वीकार करने के बजाय उन्हें अपमानित कर लंका से निकाल देता है।इसके बाद विभीषण लंका छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में पहुंचते हैं। वानर सेना के कुछ सदस्यों द्वारा विभीषण पर संदेह जताए जाने के बावजूद भगवान श्रीराम अपने उदार, दयालु और मर्यादित स्वरूप का परिचय देते हैं। वह विभीषण को शरण प्रदान करते हुए यह संदेश देते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, उसकी रक्षा करना उनका धर्म है। इस प्रसंग ने दर्शकों को भावुक कर दिया। लीला के माध्यम से संदेश दिया गया कि व्यक्ति को हमेशा सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए, भले ही इसके लिए उसे अपने परिवार या परिचितों के विरुद्ध ही क्यों न खड़ा होना पड़े।

इसके पश्चात समुद्र तट पर रामसेतु निर्माण की लीला का मंचन किया गया। लंका तक पहुंचने के लिए भगवान श्रीराम की वानर सेना समुद्र पार करने की योजना बनाती है। नल-नील के नेतृत्व में वानर सेना समुद्र पर पत्थरों का सेतु बनाने में जुट जाती है। कलाकारों ने इस प्रसंग को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया। रामसेतु निर्माण के दृश्य ने श्रद्धालुओं में उत्साह भर दिया और पूरा पंडाल जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। इस प्रसंग के माध्यम से एकता, सहयोग, विश्वास और सामूहिक प्रयास की शक्ति का संदेश दिया गया।रामसेतु निर्माण के बाद की लीला में भगवान श्रीराम की ओर से अंगद को रावण के दरबार में दूत बनाकर भेजा जाता है। अंगद रावण के दरबार में पहुंचकर उसे अंतिम बार समझाते हैं कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक वापस कर दे और भगवान श्रीराम की शरण में आकर युद्ध जैसी विनाशकारी स्थिति से बच जाए। अंगद रावण को बताते हैं कि भगवान श्रीराम से युद्ध करना उसके और उसकी लंका के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। इसके बावजूद रावण अपने अहंकार में चूर होकर अंगद की बात मानने से इनकार कर देता है।इसके बाद अंगद रावण के दरबार में अपना पैर जमा देते हैं और वहां मौजूद योद्धाओं को चुनौती देते हैं कि यदि उनमें शक्ति है तो वे उनका पैर हिलाकर दिखाएं। रावण के दरबार में मौजूद कई योद्धा अंगद का पैर हटाने का प्रयास करते हैं, लेकिन कोई भी सफल नहीं हो पाता। इस दृश्य को कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया, जिसे देखकर दर्शक रोमांचित हो उठे। अंगद-रावण संवाद के माध्यम से यह दिखाया गया कि अहंकार व्यक्ति की बुद्धि पर पर्दा डाल देता है और सही सलाह मिलने के बावजूद वह विनाश के मार्ग पर आगे बढ़ता रहता है।रामलीला मंचन में आकाश कुमार सिंघल, मास्टर कन्हैया सैनी, प्रशांत वर्मा, हरि बल्लभ शर्मा सहित दर्जनों कलाकारों ने विभिन्न भूमिकाओं में शानदार अभिनय प्रस्तुत किया। कलाकारों की संवाद अदायगी, भाव-भंगिमाओं और प्रभावशाली प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया। मंचन के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के आदर्शों को याद करते हुए धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का संदेश ग्रहण किया।

श्री रामलीला के इन प्रसंगों के माध्यम से दर्शकों को बताया गया कि सच्चाई, मर्यादा और धर्म का मार्ग ही मनुष्य को सही दिशा दिखाता है। भगवान श्रीराम का चरित्र शरणागत की रक्षा, वचन के पालन और न्याय के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है, जबकि रावण का अहंकार यह सीख देता है कि गलत मार्ग पर चलने और उचित सलाह को ठुकराने का परिणाम अंततः विनाश होता है। रामलीला मंचन के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।

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